उनकी सफलता से प्रेरित होकर इलाके के अन्य युवा किसानों ने अब उन्हें अपना आदर्श बना लिया है। लंबोदर दर्वे ने सबसे पहले राची में खेती के गुर सीखे। वहा इन्होंने बजाप्ता प्रशिक्षण लिया। फिर अपने गाव घोरटोपी लौटे। वर्षो से बंजर पड़े करीब 30 बीघा से भी अधिक जमीन पर सहयोगियों की मदद से दलहन फसल [मूंग] की खेती शुरू की। दर्वे का उत्साह बढ़ाने में दुमका का कृषि विज्ञान केंद्र भी पीछे नहीं रहा। केंद्र ने नि:शुल्क 29 किग्रा बीज और डीएपी उन्हें दिया। कुछ महीनों बाद ही वह बंजर भूमि हरियाली में बदल गई। इसके बाद दर्वे ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। तुरंत बाद प्रयोग के तौर पर 10 बीघे में मालदा, गुलाब, खस, आम्रपाली प्रजाति के आमों के पेड़ सहित अन्य पौधे लगवाए। यह भी लहलहा उठा।
अब दर्वे इलाके के लिए एक आदर्श बन गए हैं। उन्होंने अपने प्रयासों से यह बताने की भी भरसक कोशिश की कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो आर्थिक तंगी आसपास भी नहीं सकती। 20 डिसमील बंजर भूमि पर उन्होंने एक तालाब खुदवाया। इसमें मछली व बत्तक पालने का काम शुरू किया।
डॉ शशांक शर्मा
आगरा
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